नज़्म :- " सच कहो ना तुम रोज़ मुझसे इतना जगड़ा कयों करती हो "
" सच कहोना तुम रोज़ मुझसे इतना जगड़ा कयों करती हो " " फिर रोज़ कॉलेज जा मेरा पीछा क्यों करती हों "...
क्लास में जब टीचर हमकों...; कुछ भी पढ़ाते थे... ; तुम उन्हें देखने के बजाय मुझे हि क्युं देखती हो..? ;
हर रोज़ तुम कोई ना कोई बहाना ढूढ़ती रहती हो..., " सच कहो ना तुम मुझसे इतना जगड़ा क्यों करती हो "...;
" जब इम्तिहान के दिनों में सब लोग परेशान रहते थे "...; " तब छुप छुप कर तुम हम पर नकल की पर्चियाँ फेंका करते थे... एकबार उस पर्ची को मैंने गुस्से में दे फेंका था....; तभी पर्ची को फेंकते हुए टीचरने मुझको पकडा था..; गुस्से में टीचर ने पर्ची उठाकर मेरे सामने देखा था...;
पर्ची को देख उन्होंने भी मुझे देख मुस्कुराया था..;
में भी सोच में पड़ गया की
तुमने ऐसा क्या लिखा था...., इम्तिहान के बाद मैंने उस
पर्ची को उठाकर देखा था...;
" तुम ने पर्ची में दिल बनाके
मेरा हि नाम लिखा था "....;
" तुम इतना मुझको चाहती हो तो
कहने से क्युँ कतराति हो "
" सच कहो ना तुम मुझसे
इतना जगड़ा क्युं करती हो "..;
" लोग कहते हैं जगड़ा तुमसे वही इन्सान करता है..; जो अपने से ज्यादा तुम्हें खुब महोब्बत करता हैं "..;
तुम्हारें जगड़े का कारण मुझ अब समझ में आ गया है..; तुम्हें कुछ भी करके मेरा ध्यान अपनी और खिचवाना हैं...;
तुम इतनी मशक्कत करती हो तो इतना थोड़ा करदो ना " में तुमको बहोत चाहती हूँ बस इतना मुझको कहदो ना "
ये रोज़ रोज़ मुझसे बात करने का बहाना क्युं बनाती " सच कहो ना तुम मुझसे इतना जगड़ा क्युं करती हों "
© कवि सात्विक देराश्री
Khub saras kavi
ReplyDeletevery well written!!
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